सुप्रीम कोर्ट के नए नियम: धारा 498A में गिरफ्तारी से पहले क्या करना होगा? मामला: शिवांगी बंसल बनाम साहिब बंसल (2025 लाइव लॉ SC 735) 1. FIR के बाद 2 महीने तक कोई गिरफ्तारी नहीं शिकायत या FIR दर्ज होने के बाद पहले 2 महीने पुलिस किसी को गिरफ्तार नहीं कर सकती। 2. मामला जाएगा "फैमिली वेलफेयर कमिटी" (FWC) के पास ये 2 महीने में पूरा केस FWC को भेजा जाएगा। FWC क्या करेगी? → पति-पत्नी और उनके परिवार के 4-4 बड़े सदस्यों से बात करेगी। → 1 महीने में रिपोर्ट बनाकर मजिस्ट्रेट को देगी। 3. FWC कौन है? हर जिले में कम से कम एक कमिटी होगी। 3 सदस्य होंगे: युवा मध्यस्थ (मीडिएटर) रिटायर्ड जज सामाजिक कार्यकर्ता या वकील 4. पुलिस और जज का काम पुलिस: → अपनी जांच करेगी। → लेकिन FWC की रिपोर्ट आने तक गिरफ्तारी नहीं कर सकती। → गिरफ्तारी करनी हो तो लिखित में कारण बताना होगा। मजिस्ट्रेट (जज): → FWC की रिपोर्ट पढ़ने के बाद ही गिरफ्तारी की इजाजत देगा। 5. और खास बातें जांच सिर्फ सीनियर पुलिस अफसर करेगा। उसका बड़ा अफसर निगरानी रखेगा ताकि गलत गिरफ्तारी न हो। अगर दोनों पक्ष समझौता कर लें, तो जिला जज केस खत्म कर ...
घरेलू हिंसा मामले में पति के अधिकार और कानूनी सुरक्षा ---------------------------------------- घरेलू हिंसा अधिनियम (Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005) का मुख्य मकसद महिलाओं को असली हिंसा या उत्पीड़न से बचाना है, लेकिन व्यावहारिक रूप से कई बार इसका गलत फायदा पक्षकारों द्वारा उठाया जाता है। अक्सर पत्नी या पीड़िता द्वारा अपने पति या परिजनों पर झूठे या अतिरंजित इल्ज़ाम लगाकर कानूनी दबाव बनाया जाता है, ताकि रखरखाव, संपत्ति या अन्य विवादों में फायदा लिया जा सके। ऐसे हालात में पति के पास भी अपने हक और कानूनी रक्षा के विकल्प मौजूद हैं। 1. झूठे DV मामले की पहचान सबसे पहले जान लें कि DV केस आपराधिक नहीं, बल्कि सिविल प्रकृति का है। इसमें गिरफ्तारी नहीं होती; मजिस्ट्रेट कोर्ट में आवेदन पर सुनवाई होती है। कई लोग इसे क्रिमिनल मामला समझकर घबरा जाते हैं, जबकि DV एक्ट का फोकस सिर्फ सुरक्षा आदेश (Protection Order), निवास अधिकार (Residence Order) और वित्तीय मदद जैसी राहत पर है। 2. पति के मुख्य कानूनी हक A. पूर्ण सुनवाई का अधिकार पति को कोर्ट में अपना पक्ष पूरी तरह प्रस्तुत करने का हक ह...
जमीन रजिस्ट्री के बाद दाखिल-खारिज (mutation) न होने पर रजिस्ट्री को रद्द करवाने की समय सीमा का सीधा उल्लेख भारतीय विधि में नहीं है, लेकिन इसे सामान्य कानूनों के तहत चुनौती दी जा सकती है। इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण प्रावधान और केस कानून निम्नलिखित हैं: 1. भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 (Indian Contract Act, 1872) की धारा 17 और 18 (Fraud and Misrepresentation) के तहत अगर यह साबित होता है कि रजिस्ट्री धोखाधड़ी या गलत जानकारी के आधार पर की गई है, तो इसे चुनौती दी जा सकती है। Limitation Act, 1963 के अनुसार, सामान्यतः धोखाधड़ी (Fraud) के आधार पर रजिस्ट्री रद्द करवाने के लिए 3 साल की सीमा होती है। यह समय सीमा तब से शुरू होती है जब धोखाधड़ी या गलती का पता चलता है। 2. Case Law Suraj Lamp & Industries Pvt. Ltd. v. State of Haryana (2011) : इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि रजिस्ट्री या सेल डीड के साथ दाखिल-खारिज का संबंध केवल रिकॉर्ड अपडेट करने के लिए होता है और इसकी कमी से रजिस्ट्री की वैधता पर कोई असर नहीं पड़ता। Satya Pal Anand v. State of Madhya Pradesh (2...
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें